Friday, May 18, 2018

वायुमंडल की संरचना एवं संगठन


पृथ्वी के चारों तरफ व्याप्त गैसीय आवरण, जो पृथ्वी के आकर्षण शक्ति के कारण टिका हुआ है, वायुमंडल कहलाता है।
अनुमानतः संपूर्ण वायुमंडलीय संगठन का 97% भाग 29 कि.मी. की ऊंचाई तक ही अवस्थित है।
पृथ्वी के वायुमंडल का निर्माण विभिन्न अवयवों से हुआ है जिनमें गैसीयकण, जलवाष्प तथा धूलकण सम्मिलित हैं।
शुष्क वायु में सामान्यतः 8% नाइट्रोजन, 20.95% ऑक्सीजन, 0.93% आर्गन, 0. 038% कार्बन डाई ऑक्साइड तथा शेष अन्य गैसों की मात्रा होती है।
ऑक्सीजन एक ज्वलनशील गैस है। नाइट्रोजन ऑक्सीजन को तनु करता है एवं इसकी ज्वलनशीलता को नियंत्रित करता है।
कार्बन डाइऑक्साइड एक ग्रीन हाउस गैस है। यह सौर विकिरण के लिए पारदर्शी है परन्तु पार्थिक विकिरण के लिए यह अपारदर्शक की तरह कार्य करता है।
ओजोन सूर्य से आने वाली लगभग सभी पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर पृथ्वी को अत्यधिक गर्म होने से बचाता है।
कार्बन डाइऑक्साइड, ऑक्सीजन तथा नाइट्रोजन जैसे भारी गैस निचले वायुमंडल में पाए जाते हैं जबकि हीलियम, निओन, क्रिप्टान एवं जेनान जैसी हल्की गैस वायमंडल में अधिक ऊंचाई पर पाई जाती है।
विभिन्न गैसों के अलावा वायुमंडल में जलवाष्प, धूलकण, लवण के कण, परागकण एवं ज्वालामुखी राख विभिन्न अनुपात में पाए जाते हैं।
वायुमंडल में जलवाष्प की मात्रा लगभग 5% तक रहती है। (सम्पूर्ण वायमंडलीय मात्रा का)
भूतल से 5 किमी. तक वायमंडल में पाए जाने वाले समस्त वाष्प का 90% भाग पाया जाता है।
ध्रुवीय क्षेत्रों में वायुमंडलीय दशा शुष्क होती है क्योंकि वहां लगभग नगण्य मात्रा में जलवाष्प पाया जाता है (लगभग 1% जबकि आर्द्र उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में यह 5% तक पाया जाता है।
वायुमंडल में उपस्थित जलवाष्प विभिन्न मौसमी घटनाओं के लिए उत्तरदायी होता है। ओलावृष्टि एवं मेघगर्जन जैसी घटनाएं जलवाष्प से ऊर्जा पाकर ही सम्पादित होती है।
जलवाष्प पृथ्वी के लिए एक कंबल की तरह कार्य करता है जो इसे न तो अत्यधिक गर्म और न ही अत्यधिक ठंडा होने देता है। क्योंकि यह सौर्य विकिरण को अवशोषित करने के साथ-साथ पार्थिव विकिरण को भी सुरक्षित रखता है।
अधिकांश सूक्ष्मकण वायुमंडल के निचले भाग में पाए जाते हैं। इन ठोस सूक्ष्म कणों के कारण ही सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय लाल एवं नारंगी जैस नयनाभिराम दृश्य संभव हो पाते हैं।
सूर्य से आने वाली किरणों में प्रकीर्णन के कारण ही आकाश का रंग नीला प्रतीत होता है।
जलवायु के दृष्टिकोण से ये ठोस कण बहुत ही महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि ये ठोस कण ही आर्द्रताग्राही नाभिक का कार्य करते हैं, जिनके चारों तरफ संघनन के कारण जलबूंदों का निर्माण होता है।
बादल तथा वर्षण एवं संघनन के विभिन्न प्रतिरूप इन जलवाष्प के कारण ही अस्तित्व में आते हैं।
वायमुंडल की संरचना:
वायुमंडल में वायु के विभिन्न संकेन्द्रिक परतें पायी जाती है। जिनके तापमान और घनत्व मे भिन्नता होती है। तापमान के ऊर्ध्वाधर वितरण के आधार पर वायुमंडल को निम्नलिखित भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
क्षोभमंडल
क्षोभमंडल वायुमंडल का सबसे निचला एवं सघन परत है। यह परत संपूर्ण वायुभार का लगभग 75% स्वयं में समाविष्ट किए हुए है।
भूतल से इसकी औसत ऊंचाई लगभग 14 किमी. है। यह ध्रुवीय क्षेत्रों में लगभग 8 किमी. की ऊंचाई तक तथा विषुवत रेखा के समीप 18 किमी. की ऊंचाई तक विस्तृत है।
भमंडल की मोटाई विषुवत रेखा के समीप सर्वाधिक पाई जाती है
चूंकि धूलकण और जलवाष्प इसी मंडल में पाया जाता है, अतः सारी मौसमी घटनाएं जैसे कुहरा, धुंध, बादल, ओस, वर्षा, ओलावृष्टि, तडि़त-गर्जन, आदि इसी मंडल में घटित होती है।
इस मंडल की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि कि ऊंचाई बढ़ने के साथ तापमान में यहां कमी आती है। तापमान में कमी 165 मीटर की ऊंचाई पर 1°C अथवा 1000 फीट पर 3.6°F अथवा 6.5°C/किमी. की दर से होती है। इसे सामान्य ताप ह्रास दर कहते हैं।
क्षोभमंडल एवं समतापमंडल के मध्य एक संक्रमण क्षेत्रा पाया जाता है जिसे ‘‘ट्रोपोपाज’’ कहते हैं।
समतापमंडल
समतापमंडल एवं मध्यमंडल के बीच एक संक्रमण क्षेत्र पाया जाता है, जिसे ‘‘स्ट्रेटोपाज’’ के नाम से जानते हैं।
समताप मंडल के बिल्कुल ऊपरी भाग में तापमान 0°C तक पाया जाता हैं
समताप मंडल में बादल बिल्कुल नहीं के बराबर पाया जाता है एवं कुछ अंश में जलवाष्प पाया जाता है।
ओजोन का सर्वाधिक घनत्व 20 से 35 किमी. के मध्य पाया जाता है। इसलिए इसे ‘‘ओजोन परत’’ भी कहा जाता है।
तापमान में वृद्धि, इस परत में ओजोन की उपस्थिति के कारण होता है जो सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर लेती हैं
इस परत के निचले भाग में लगभग 20 किमी. की ऊंचाई तक तापमान स्थिर पाया जाता है। तत्पश्चात् यह 50 किमी. की ऊंचाई तक क्रमिक रूप से बढ़ता जाता हैं
3. मध्यमंडल
समतापमंडल 50 किमी. की ऊंचाई तक क्षेभमंडल के ऊपर विस्तृत है।
तापमंडल को पुनः दो भागों में बांटा जाता है:
समतापमंडल के ऊपर 80 किमी. की ऊंचाई तक मध्यमंडल का विस्तार पाया जाता है। इस परत में ऊंचाई में वृद्धि के साथ तापमान में भी वृद्धि दर्ज की जाती है।
I. आयनमंडल
आयनमंडल का विस्तार 80 से 400 किमी. के बीच है।
इस परत में तापमान में त्वरित वृद्धि होती है तथा इसके ऊपरी भाग में तापमान 1000°ब् तक पहुंच जाता है।
इसी परत से रेडियो तरंगे परावर्तित होकर पुनः पृथ्वी पर वापस आती है।
II. बाह्यमंडल
आयनमंडल के बाद का बाहरी वायुमंडलीय आवरण, जो 400 किमी. के बाद का ऊपरी वायुमंडलीय भाग है, आयतनमंडल कहलाता है।
इस मंडल के बारे में विशेष जानकारी प्राप्त नहीं की जा सकी है।
रासायनिक संगठन के आधार पर वायुमंडल को दो भागों में बांटा गया है:
सममंडल: 88 किमी. की ऊंचाई तक विस्तार वाले वायुमंडलीय आवरण को सममंडल कहा जाता है। इस मंडल की विशेषता यह है कि इसमें पाए जाने वाले गैसों के अनुपात में समानता पाई जाती है। सममंडल के अंतर्गत क्षोभमंडल, समतापमंडल तथा मध्यमंडल का विस्तार पाया जाता है।
विषममंडल: 90 किमी. से 10,000 किमी. तक इस मंडल का विस्तार है। इस मंडल के विभिन्न परतों के भौतिक एवं रासायनिक विशेषताओं में विविधता पाई जाती है।
वायुमंडल का तापमान
वायुमंडल के लिए ऊर्जा का मुख्य स्रोत सौर्यिक ऊर्जा है। सूर्य के सतह का औसत तापमान 5700 °C (6000 °C) है। अनुमान के आधार पर सूर्य के भीतरी सतह (कोर) का तापमान 1.5- 2. 0 करोड़ केल्विन बताया जाता है।
पृथ्वी अपने छोटे आकार एवं सूर्य से अत्यधिक दूरी के कारण कुल सौर्य विकिरण का एक अल्पांश ही प्राप्त कर पाती है। लेकिन, फिर भी पृथ्वी द्वारा प्राप्त यह ऊर्जा 23 ट्रिलियन अश्व शक्ति के बराबर है।
सूर्याताप आपतित सौर्य विकिरण है। यह लघु तरंग के रूप में प्राप्त होता है। पृथ्वी की सतह एक मिनट में एक वर्ग से.मी. सतह पर 2 कैलोरी ऊर्जा (2 कैलोरी/सेमी.2/मिनट) प्राप्त करती है, यह सौर्य स्थिरांक कहलाता है।
आपतित सौर विकिरण एक प्रकाशपुंज के रूप में होता है जिसमें विभिन्न तरंगदैध्र्य वाली किरणों होती है। सूर्य से निष्काषित ऊर्जा विद्युत चुम्बकीय तरंग के रूप में होती है।
दीर्घ तरंगदैध्र्य वाली किरणें वायुमंडल में ज्यादा अवशोषित होती हैं, जिन्हें इन्फ्रारेड किरण कहते हैं। लघु तरंग वाली किरणें अल्ट्रावायलेट कहलाती है।
वायुमंडल का उष्मण एवं शीतलन
हवा भी अन्य पदार्थों की तरह तीन तरह से गर्म होती हैµविकिरण, चालन एवं संवहन।
विकिरण में कोई भी वस्तु या पिंड सीधे तौर पर उष्मा तरंग को प्राप्त कर गर्म होती है। यही एकमात्रा ऐसी विधि है जिसमें निर्वात में भी उष्मा संरचरण होता है। यह उष्मा स्थांतरण का एक अति महत्वपूर्ण तरीका है।
पृथ्वी सौर विकिरण को लघु तरंग के रूप में ग्रहण करती है एवं इसे दीर्घ तरंग के रूप में निष्काषित करती है, जिसे पार्थिक विकिरण कहते हैं।
पृथ्वी का वायुमंडल सौर विकिरण के लिए पारदर्शी है परन्तु पार्थिक विकिरण के लिए अपारदर्शक की तरह कार्य करता है। कार्ब डाई ऑक्साइड तथा जलवाष्प दीर्घ तरंग के अच्छे अवशोषक के रूप में कार्य करते हैं।
वायुमंडल आपतित सौर विकिरण की तुलना में पार्थिक विकिरण से ज्यादा उष्मा प्राप्त करता है।
जब किसी वस्तु में उष्मा का स्थानांतरण अणुओं में गति के कारण होता है, चालन कहलाता है। संवहन में वस्तुओं के एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचने के कारण उष्मा का स्थानांतरण होता है।
तापमान का अक्षांशीय संतुलन
किसी भी दो अक्षांश रेखाओं पर उष्मा ग्रहण करने एवं उसे त्यागने में समानता नहीं है। इसके बावजूद कोई भी अक्षांश न तो अत्यधिक गर्म एवं न ही अत्यधिक ठंडा होता है।
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की ओर उष्मा का स्थानांतरण होता है।
विषुवत रेखीय क्षेत्रा से ध्रुवों की ओर उष्मा स्थानांतरण में वायुमंडल तथा सागरीय भाग विशाल ईंजन की भांति कार्य करता है।
उष्मा के संतुलन से ही वायुराशि एवं सागरीय धाराओं का प्रादुर्भाव होता है।
मध्य अक्षांशीय क्षेत्र (30° -50°) उष्मा स्थानांतरण का एक विस्तृत क्षेत्र है। अतः यह क्षेत्र तडि़तझंझा जैसी मौसमी घटनाओं के लिए जाना जाता है।
दाब कटिबंध एवं पवन संचार
वायु का अपना एक भार होता है। इस कारण धरातल पर वायु अपने भार द्वारा दबाव डालती है। धरातल पर या सागरतल पर क्षेत्राफल की प्रति इकाई पर ऊपर स्थित वायुमंडल की समस्त परतों के पड़ने वाले भार को ही ‘वायुदाब’ कहा जाता है।
सागरतल एवं वायुदाब सर्वाधिक होता है। सामान्य रूप से 1800 फीट (540 मी.) की ऊंचाई तक वायुमंडल का आधा दाब स्थित होता है।
वायुदाब का मापन बैरोमीटर नामक यंत्र से किया जाता है
वायु की गति एवं दिशा को प्रभावित करने वाले बल निम्नलिखित हैं
पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण शक्ति:
दाब प्रवणता बल: यह बल उच्च वायुदाब वाले क्षेत्रों से वायु को निम्न वायुदाब वाले क्षेत्रों की ओर प्रवाहित करता है।
कोरिआलिस बल: यह एक विक्षेपक बल है। इस बल के कारण वायु की दिशा में परिवर्तन, उत्तरी गोलार्ध में दाहिनी ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर होता है।
घर्षण बल: सतह के समीप यह वायु की गति को प्रभावित करता है। सतह से ऊंचाई की ओर जाने पर यह बल अपेक्षाकृत कम होता जाता है।
भूविक्षेपी पवन: जब पवन की दिशा समदाब रेखाओं के समानांतर हो जाती है तो ऐसे पवन को भूविक्षेपी पवन कहते हैं। ऊपरी क्षोभमंडल में दाब प्रवणता बल एवं कोरिआलिस का मान बराबर होने के कारण इसकी उत्पत्ति होती है।
दाब कटिबंध
एक अक्षांश से दूसरे अक्षांश पर वायुदाब में भिन्नता पाई जाती है जिससे विभिन्न दाब कटिबंध देखने को मिलते हैं।
उत्तरी गोलार्ध में चार कटिबंध तथा दक्षिणी गोलार्ध में चार कटिबंध पाए जाते हैं।
दोनों गोलार्द्धों में दो-दो कटिबंध तापमान के कारण अस्तित्व में आते हैं। ये हैं:
विषुवतरेखीय निम्न वायुदाब का क्षेत्र
ध्रूवीय उच्च वायुदाब का क्षेत्र
अन्य दो-दो दाब कटिबंधों की उत्पत्ति गतिकी के कारण होती है। ये हैं:
उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब
उपध्रुवीय निम्न वायुदाब का क्षेत्र
विषुवतरेखीय निम्न वायुदाब
इस वायुदाब की पेटी का विस्तार एक संकीर्ण पट्टी के रूप में है। यहां सूर्य की किरणें लम्बवत् पड़ती है तथा वर्ष भर दिन-रात बराबर होते हैं।
अत्यधिक तापमान के कारण हवाएं गर्म होकर फैलती हैं तथा ऊपर उठती हैं। शीघ्र ही ‘ट्रोपोपाज’ तक बादल का ऊर्ध्वाधर स्तंभ पहुंच जाता है तथा घनघोर मूसलाधार वर्षा होती है।
इसी पेटी में वायु के अभिसरण के कारण अन्तरा-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्रा ;प्ज्बर््द्ध का निर्माण होता है।
इस पेटी में हेडली कोशिका का निर्माण होता है।
विषुवतरेखीय निम्नवायुदाब की पेटी में अभिसरित वायुरराशि को उत्तरी गोलार्ध में उत्तर-पूर्व व्यापारिक पवन तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिण-पूर्व व्यापारिक पवन की संज्ञा देते हैं।
ये व्यापारिक पवन प्रचुर मात्रा में नमी धारण करते है। जब ये हेडली संचरण के सहारे आरोहित होते हैं।
उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब की पेटी
दोनों गोलार्धों में 20° से 35° अक्षांशों के मध्य यह पेटी पाई जाती है। इस क्षेत्रा में शुष्क एवं उष्ण वायु पाई जाती है। यहां आकाश बिल्कुल साफ एवं बादल रहित होता है।
यद्यपि इस पेटी के निर्माण का गतिकी कारण अत्यंत जटिल है, तथापि सामान्यतया इसका निर्माण हेडली कोशिका के सहारे वायु के अवरोहण एवं अवतलन से होता है।
जब वायु का अवतलन इन क्षेत्रों में होता है तो वायु गर्म हो जाती है तथा सतह पर आकर इनका अपसरण होता है। इन क्षेत्रों में प्रतिचक्रवातीय दशा पाई जाती है।
उपध्रुवीय निम्नवायुदाब की पेटी
इस पेटी का विकास 60° उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों के आसपास होता है।
इस क्षेत्र में दो भिन्न तापमाना वाली वायुराशियों के मिलने से ध्रुवीय वाताग्र का निर्माण होता है।
दक्षिणी गोलार्ध में इस पेटी में अंटाक्रटिका के चारों ओर एक उपध्रुवीय चक्रवातीय व्यवस्था का निर्माण होता है।
ध्रुवीय उच्च वायुदाब की पेटी
कम तापमान के कारण इस पेटी का विकास होता है। यहां पर शुष्क एवं ठंडी हवाओं का अपसरण क्षेत्रा है, जिससे यहां प्रतिचक्रवातीय दशा पाई जाती है।
यहां पर वायु की दिशा उत्तरी गोलार्ध में घड़ी की दिशा में तथा दक्षिणी गोलार्ध में घड़ी के विपरीत दिशा में होती है।

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